“मनु स्मृति”- प्रथम अध्याय (सृष्टि उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय) भाग – 9

गतांक से आगे .... (धर्मोत्पत्ति विषय की भूमिका) (१|५५ से ५७ तक) सदाचार परम धर्म – आचारः परमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त एव च...

गतांक से आगे ....

(धर्मोत्पत्ति विषय की भूमिका)

(१|५५ से ५७ तक)

सदाचार परम धर्म –

आचारः परमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त एव च ।
तस्मादस्मिन्सदा युक्तो नित्यं स्यादात्मवान्द्विजः ||१०८||(५५)

अर्थात - (श्रुत्युक्तः च स्मार्त एव) वेदों में कहा हुआ और स्मृतियों में भी कहा हुआ जो आचारः आचरण है परमः धर्मः वही सर्वश्रेष्ठ धर्म है (तस्मात्) इसीलिए आत्मवान् द्विजः आत्मोन्नति चाहने वाले द्विज को चाहिए कि वह (अस्मिन्) इस श्रेष्ठाचरण में (सदा नित्यं युक्तः स्यात् )सदा निरन्तर प्रयत्नशील रहे ।

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उपरोक्त श्लोक देकर स्वामी जी ने निम्न अर्थ दिया है –

‘‘कहने सुनने – सुनाने, पढ़ने – पढ़ाने का फल यह है कि जो वेद और वेदानुकूल स्मृतियों में प्रतिपादित धर्म का आचरण करना । इसलिये धर्माचार में सदा युक्त रहे ।’’
(स० प्र० तृतीय समु०)

‘‘जो सत्य – भाषणादि कर्मों का आचरण करना है वही वेद और स्मृति में कहा हुआ आचार है । ’’

(स० प्र० दशम समु०)

आचारहीन को वैदिक कर्मों की फलप्राप्ति नहीं –

आचाराद्विच्युतो विप्रो न वेदफलं अश्नुते ।आचारेण तु संयुक्तः सम्पूर्णफलभाज्भवेत् ||१०९||(५६)

अर्थात - आचारात् विच्युतः विप्रः जो धर्माचरण से रहित द्विज है वह वेदफलं न अश्नुते वेद प्रतिपादित धर्मजन्य सुखरूप फल को प्राप्त नहीं हो सकता, और जो आचारेण तु संयुक्तः विद्या पढ़ के धर्माचरण करता है, वही सम्पूर्णफलभाक् भवेत् सम्पूर्ण सुख को प्राप्त होता है ।
(स० प्र० तृतीय समु०)

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एवं आचारतो दृष्ट्वा धर्मस्य मुनयो गतिम् ।
सर्वस्य तपसो मूलं आचारं जगृहुः परम् ||११०||(५७)

अर्थात - एवम् इस प्रकार आचारतः धर्माचरण से ही धर्मस्य धर्म की गतिम् प्राप्ति एवं अभिवृद्धि दृष्ट्वा देखकर मुनयः मुनियों ने सर्वस्य तपसः परं मूलम् सब तपस्याओं का श्रेष्ठ मूल आधार आचारम् धर्माचरण को ही जगृहुः स्वीकार किया है ।

धर्मोत्पत्ति विषय

(१|५८ से ७८ तक)

विद्वानों द्वारा सेवित धर्म का वर्णन प्रारम्भ –

विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यं अद्वेषरागिभिः ।
हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत ||१२०||[२|१] (५८)

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अर्थात - अद्वेषरागिभिः सद्भिः विद्वद्भिः नित्यं सेवितः )जिसका सेवन रागद्वेष – रहित श्रेष्ठ विद्वान् लोग नित्य करें यो हृदयेन अभ्यनुज्ञातः धर्मः जिसको हृदय अर्थात् आत्मा से सत्य कत्र्तव्य जाने वही धर्म माननीय और करणीय है । तं निबोधत उसे सुनो ।
(स० प्र० दशम समु०)

‘‘जिसको सत्पुरूष रागद्वेषरहित विद्वान् अपने हृदय से अनुकूल जानकर सेवन करते हैं , उसी पूर्वोक्त को तुम लोग धर्म जानो ।’’ (सं० वि० गृहा० प्र०)

सकामता – अकामता विवेचन – 

कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता ।
काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः ||१२१||[२|२](५९)

अर्थात - हि क्यों कि इह इस संसार में कामात्मता अत्यन्त कामात्मता च और अकामता निष्कामता प्रशस्ता न अस्ति श्रेष्ठ नहीं है । वेदाधिगमः च वैदिकः कर्मयोगः वेदार्थज्ञान और वेदोक्त कर्म काम्यः ये सब कामना से ही सिद्ध होते हैं ।
(स० प्र० दशम समु०)

‘‘अत्यन्त कामातुरता और निष्कामता किसी के लिए भी श्रेष्ठ नहीं, क्यों कि जो कामना न करे तो वेदों का ज्ञान और वेदविहित कर्मादि उत्तम कर्म किसी से न हो सकें, इसलिये ।’’
(स० प्र० तृतीय समु०)

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संकल्पमूलः कामो वै यज्ञाः संकल्पसंभवाः ।
व्रतानि यमधर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृताः ||१२२||[२|३] (६०)

अर्थात- जो कोई कहे कि मैं निष्काम हूँ वा हो जाऊं तो वह कभी नहीं हो सकता, क्यों कि – सर्वे सब काम यज्ञाः व्रतानि यमधर्माः यज्ञ, सत्यभाषणादि व्रत, यम-नियमरूपी धर्म आदि संकल्पजाः संकल्प ही से बनते हैं कामः वै निश्चय से प्रत्येक कामना संकल्पमूलः संकल्पमूलक होती है अर्थात् संकल्प से ही प्रत्येक इच्छा उत्पन्न होती है

(स० प्र० दशम समु०)

अकामस्य क्रिया का चिद्दृश्यते नेह कर्हि चित् ।
यद्यद्धि कुरुते किं चित्तत्तत्कामस्य चेष्टितम् ||१२३|| [२|४] (६१)

अर्थात - क्यों कि यत् यत् किंचित् कुरूते जो – जो हस्त, पाद, नेत्र, मन आदि चलाये जाते हैं (तत्तत् कामस्य चेष्टितम्) वे सब कामना ही से चलते हैं । अकामस्य जो इच्छा न हो तो काचिद्क्रिया आंख का खोलना और मींचना भी न दृश्यते नहीं हो सकता ।
(स० प्र० दशम समु०)

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‘‘मनुष्यों को निश्चय करना चाहिये कि निष्काम पुरूष में नेत्र का संकोच, विकास का होना भी सर्वथा असम्भव है । इससे यह सिद्ध होता है कि जो – जो कुछ भी करता है वह – वह चेष्टा कामना के बिना नहीं है ।’’
(स० प्र० तृतीय समु०)

तेषु सम्यग्वर्तमानो गच्छत्यमरलोकताम् ।
यथा संकल्पितांश्चेह सर्वान्कामान्समश्नुते ||१२४|| [२|५] (६२)

अर्थात - उन वेदोक्त कर्मों में सम्यक् वर्तमानः अच्छी प्रकार संलग्न व्यक्ति अमरलोकतां गच्छति मोक्ष को प्राप्त करता है च और यथा संकल्पितान् सर्वान् एव कामान् संकल्प की गई सभी कामनाओं को समश्नुते भलीभांति प्राप्त करता है ।

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अनुशीलन :–

वुलर द्वारा घोषित प्रक्षिपत्ता पर विचार –

वुलर आदि पाश्चात्य विद्वानों ने १२१ से १२४ श्लोकों को प्रक्षिप्त माना है ! उनकी युक्ति है कि यहाँ सकामता और निष्कामता का कोई प्रसंग नहीं है, अतः ये श्लोक प्रसंग विरुद्ध है ! उनकी युक्ति मान्य नहीं है, क्यूंकि १२५ वे श्लोक में धर्म का लक्षण कहा है और उनमे वेदों का सर्वप्रथम एवं प्रमुख स्थान है ! ये श्लोक अगले श्लोकों की भूमिका के रूप में है, १२१ वें श्लोक में जो ‘वेदाधिगमः’ शब्द का प्रयोग किया है, उससे यह संकेत मिलता है ! इस प्रकार इनमे प्रसंग विरोध नहीं आता !

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धर्म के मूलस्त्रोत और आधार-

वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचारश्चैव साधूनां आत्मनस्तुष्टिरेव च ||१२५|| [२|६] (६३)

अर्थात – (अखिलः वेदः) सम्पूर्ण वेद अर्थात चारों वेद (च) और (तद्विदां) उन वेदों के पारंगत जिन्होंने २|१ से २|२२४ में प्रिक्त विधिपूर्वक वेदाध्यन किया है ] विद्वानों के (स्मृतिशीले) रचे हुए स्मृतिग्रन्थ अर्थात वेदानुकूल धर्मशास्त्र और श्रेष्ट गुणों से संपन्न स्वभाव (च) और (साधुनाम एवं आचारः)श्रेष्ठ सत्याचरण करनेवाले व्यक्तियों की (आत्मनः-त्रुष्टिः) अपनी आत्मा की संतुष्टि एवं प्रसन्नता अर्थात् जिस कर्म के करने में भय, शंका, लज्जा न हो अपितु सात्विक संतुष्टि और प्रसन्नता का अनुभव हो, ये चार (धर्ममूलम) धर्म के मूलस्त्रोत = उत्पत्ति- स्थान या आधार है |

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‘‘इसलिये सम्पूर्ण वेद, मनुस्मृति तथा ऋषिप्रणीत शास्त्र, सत्पुरूषों का आचार और जिस – जिस कर्म में अपना आत्मा प्रसन्न रहे अर्थात् भय, शंका, लज्जा जिसमें न हो उन कर्मों का सेवन करना उचित है । देखो! जब कोई मिथ्याभाषण चोरी आदि की इच्छा करता है तभी उसके आत्मा में भय, शंका, लज्जा, अवश्य उत्पन्न होती है । इसलिये वह कर्म करने योग्य नहीं है ।’’

अनुशीलन :-

धर्म के चार लक्षणों का स्वरुप

यह श्लोक मनु स्मृति के प्रमुख आधारभूत श्लोकों में से एक है ! यहाँ मनु द्वारा वर्णित धर्म के चार लक्षणों पर मनुक्त मान्यताओं के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाता है तथा उनके स्वरुप को स्पष्ट किया जाता है –

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1. वेद – धर्म के चार मूल स्त्रोतों या साक्षात लक्षणों में सर्वप्रथम स्थान वेद का है ! [१|१२५(२|६)] चारों वेद धर्म निर्णय में परम प्रमाण है [१|१३२(२|13)] इनको श्रुति भी कहा जाता है [१|१३२(२|13)] वेद अपौरुषेय अर्थात ईश्वर रचित है [१|२३||१२|९९] और इन्ही के द्वारा संसार की वस्तुओं,धर्मों का प्रथम ज्ञान प्राप्त होता है [१|२१] वेद सभी सत्य विद्याओं के भण्डार है [१|३,२१||१२|९४,९७-९९,आदि] क्यूंकि चारों वेद धर्म के प्रथम मूल स्त्रोत है, अतः इनका कुतुर्क आदि का सहारा लेकर खंडन नहीं करना चाहिए [१|१२९(२|१०), १|१३०(२|११)] और इस प्रकार जो वेदों की अवमानना करता है वह नास्तिक है तथा समाज से बहिष्कार्य है [१|१३०(२|११)] त्रयीविद्यारूप चारों वेद – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ‘अखिलवेद’ कहे जाते है [१|२३|| ११|२६४|| १२|११२] !

2. स्मृति और शील – चारों वेदों के ज्ञाता विद्वानों द्वारा रचित स्मृतियां और उनका श्रेष्ठ गुणसंपन्न स्वभाव धर्म का दूसरा मूल्स्त्रोत है ! इन्हें धर्म शास्त्र भी कहते है [१|१२९(२|१०) जिन विद्वानों ने पूर्ण ब्रह्मचर्य और धर्मपालन पूर्वक वेदों का अध्यन मनन किया है, वहीँ प्रामाणिक धर्म-शास्त्र के प्रणेता हो सकते है तथा वही धर्म विषयक संशय में प्रमाण है, अन्य नहीं –

अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेट भवेत् |
यं शिष्टा ब्राह्मणः ब्रूयुः स धर्मः स्यादंशकितः ||१२|१०८||

धर्मेणाधिगतो यैस्तु वेदः सपरिबृंहणः |
ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ||१२|१०९||

स्मृतियाँ वेदानुकूल होने पर ही प्रामाणिक है, इसी प्रकार स्वभाव भी ! वेद विरुद्ध स्मृतियाँ अमान्य है [१२|१०६|| १२|९४]

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3. सदाचार – धर्म का तीसरा मूल्स्त्रोत ‘सदाचार’ है ! श्लोक के पूर्व पदों में उक्त भाव के अध्याहार और निम्नलिखित प्रमाणों से यह सिद्ध है कि ‘वेदवेत्ता विद्वानों’ का ‘श्रेष्ठ आचरण’ ही ‘सदाचार’ है ! क्यूंकि धर्म के दूसरे लक्षण में वेदवेत्ताओं के स्वभाव को ही धर्म का स्त्रोत माना है ! स्वभावानुसारी आचरण होता है ! इस प्रकार यह भी वेदवेत्ताओं का होना चाहिए ! इसकी पुष्टि स्वयं मनु ने की है ! १|१३६ (२|१७) में दिव्य गुणों से युक्त विद्वानों द्वारा सुशोभित देश को ‘ब्रह्मावर्त’ कहा है ! उस देश में रहने वाले उन विद्वानों के आचरण को ही ‘सदाचार’ माना है [१|१३७(२|१८)] उन्ही से समस्त शिक्षाएं ग्रहण करने का कथन है [१|१३९(२|२०)] | १|१२० में भी रागद्वेष से रहित सदाचारी विद्वानों द्वारा सेवित और उन द्वारा ह्रदय से मान्य आचरण को धर्म माना है ! वेदों में अपारंगत विद्वानों का आचरण ‘सदाचार’ नहीं कहा जा सकता !

क्रमशः
साभार – विशुद्ध मनुस्मृति
भाष्यकार – प्रो. सुरेन्द्र कुमार

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“मनु स्मृति”- प्रथम अध्याय (सृष्टि उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय) भाग – 9
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