शिवपुरी का इतिहास भाग 5 - स्व.श्री गोपालकृष्ण पौराणिक, पोहरी के जागीरदार शितोले और महात्मा नारायण दास जी त्रिवेदी

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ईश्वर को जिनसे कुछ महत्वपूर्ण कार्य कराना होता है, कदम कदम पर उनकी परीक्षा भी लेता है। अंचल के प्रथम पत्रकार, समाज सुधारक, शिक्षाविद व स्वत...




ईश्वर को जिनसे कुछ महत्वपूर्ण कार्य कराना होता है, कदम कदम पर उनकी परीक्षा भी लेता है। अंचल के प्रथम पत्रकार, समाज सुधारक, शिक्षाविद व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आचार्य गोपाल कृष्ण पौराणिक जी का जीवन वृत्त यही दर्शाता है। आज भी शिवपुरी जिले के पोहरी जनपद को पिछड़ा ही माना जाता है। उसमें भी छर्च गाँव को तो सबसे पिछड़ा कहा जा सकता है। आज से लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व उसकी क्या स्थिति रही होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। उसी छर्च कस्बे में 9 जुलाई 1900 को श्री गोपाल कृष्ण पौराणिक जी का जन्म हुआ था। जब महज तीन वर्ष के थे, तभी पिता श्री केशव प्रसाद जी का स्वर्गवास हो गया। अब उनके लालन पालन का दायित्व आ गया उनके पितामह पंडित वासुदेव जी पौराणिक पर। वे दूरदर्शी और ईश्वर परायण थे। उन्होंने बालक गोपाल को छः वर्ष की आयु में ही संस्कृत पढ़ने बनारस भेज दिया। एक वर्ष बाद बनारस से लौटकर इस तेजस्वी बालक ने अपने सुमधुर स्वर में भागवत कथा कहना प्रारंभ कर दिया। क्षेत्र वासियों को प्रभावित करने के लिए यह अनूठी बात पर्याप्त थी। तो कहा जा सकता है कि पूत के पाँव पालने में दिखने लगे और बाल्यकाल से ही पूरे क्षेत्र के लिए उनका नाम सुपरिचित हो गया। उसी दौरान वाल्यावस्था में ही विवाह कर दिया गया।

लेकिन ईश्वर तो परीक्षा लेने पर आमादा थे। अभी गोपाल मात्र आठ वर्ष के ही थे कि तभी उनके एकमात्र अभिभावक उनके दादाजी का भी आकस्मिक निधन हो गया। गोपाल पर तो मानो पहाड़ ही टूट पड़ा। लेकिन दिल पर पत्थर रखकर हिम्मत न हारते हुए अपनी इकलौती बहिन का विवाह संपन्न कराने के उपरांत 1910 में वेद एवं शास्त्रों का अध्ययन करने हेतु पुनः काशी विश्वनाथ की शरण में जा पहुंचे।

बनारस में अध्ययन करते समय ही उनका संपर्क उस समय के प्रकांड विद्वान व राष्ट्रभक्त डॉ. केशवदेव शास्त्री से हुआ। वे उनके मानो अभिभावक ही बन गए। उनकी प्रेरणा व सहयोग से पौराणिक जी अंग्रेजी का अध्ययन करने हेतु 1912 में ब्रिटिश इण्डिया की नई राजधानी दिल्ली जा पहुंचे। यह सोचकर ही हैरत होती है कि मात्र 12 से 15 वर्ष की आयु में ही वे कैसे ये कर पा रहे थे। किशोर अवस्था में ही इनका संपर्क उस समय की महान विभूतियों से हो गया था, जिनमें प्रमुख थे लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल, राय बहादुर प्यारेलाल, स्वामी सहजानंद, पंडित मोतीलाल नेहरू, एनी बेसेंट, डॉ. एन.एस. हार्डीकर। स्वाभाविक ही इनके बालमन पर राष्ट्रवाद की छाप गहरी से और गहरी होती गई। उसी दौर में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में भाग लिया और गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा स्थापित श्री निकेतन संस्थान एवं ग्रामोत्थान कार्यों का भी अध्ययन किया।

मन में अपने पिछड़े क्षेत्र के विकास का संकल्प लेकर वापस पोहरी लौटे, किन्तु छाती तो पत्थर की बननी अभी शेष थी। अठारह वर्ष के होते होते एक बालक के पिता भी हो गए और बच्चे को जन्म देकर पत्नी भी स्वर्ग सिधार गईं। योग्य तो थे ही अतः उदर पोषण की समस्या आड़े नहीं आई और स्थानीय विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक बन गए। लेकिन नौकरी ज्यादा समय तक रास नहीं आई और एक बार फिर निकल पड़े कुछ सीखने और जानने। इस बार पहुंचे गांधी जी के साबरमती आश्रम। छः महीने रहकर वहां की कार्य पद्धति का अध्ययन किया, प्रथम असहयोग आन्दोलन में नागपुर जाकर भाग लिया और फिर वापस पोहरी लौटे तो लक्ष्य निर्धारित करके। 12 जनवरी 1921 को पोहरी के ग्राम भटनावर में बच्चों को प्राथमिक शिक्षा व सुसंस्कार देने हेतु मात्र सात बालकों के साथ प्रथम “आदर्श विद्यालय” की स्थापना की।

1922 में जब इन्हें सूचना मिली कि उनके एकमात्र पुत्र की भी मृत्यु हो गई है तो उनके मुंह से शब्द निकले – ईश्वर ने मेरे मार्ग की एक मात्र रुकावट भी दूर कर दी है, अब मैं अपनी मातृभूमि की सेवा पूरे मनोयोग से कर सकूंगा।

और यह केवल जबानी जमाखर्च नहीं था, पेंसठ वर्ष की आयु में शरीर त्याग करते समय तक उनके क्रिया कलापों ने उसे सत्य प्रमाणित भी किया। उनके राष्ट्रीय कार्यों का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि 1923 में ही तत्कालीन गृह विभाग ने उनके खिलाफ आदेश राजपत्र में प्रकाशित कर दिया। लेकिन इस सबसे बेपरवाह पौराणिक जी का काम बदस्तूर चलता रहा। दो वर्ष में ही आदर्श विद्यालय लोकप्रियता की सीढियां चढ़ गया। और क्यों न हो, केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पंडित जवाहरलाल नेहरू के सहपाठी रहे प्रसिद्ध आर्यसमाजी नेता राय बहादुर प्यारेलाल के सुपुत्र रघुनन्दन जैसे लोग भी जब वहां अध्यापन कार्य करने आ गए हों। ग्वालियर राज्य के जिला स्तर पर भी उन दिनों मिडिल तक अध्ययन की सुविधा नहीं थी, किन्तु भटनावर जैसे छोटे से कसबे का यह आदर्श विद्यालय मैट्रिक तक की शिक्षा देने लगा। वे अपने छात्रों की सर्वांगीण उन्नति की चिंता भी करते थे। विद्यालय के होनहार छात्रों हरिहर निवास द्विवेदी, रामगोपाल गुप्त, रतनलाल दीक्षित और विद्यादेवी को उच्च शिक्षा हेतु आगरा व दिल्ली भेजा तो एक अन्य विद्यार्थी रतीराम को खादी व अन्य कुटीर उद्योगों के प्रशिक्षण हेतु गांधी जी के साबरमती आश्रम पहुंचाया। स्वयं गांधी जी ने अपनी पत्रिका यंग इंडिया और नवजीवन में रतीराम की भूरि भूरि प्रशंसा लिखी। इतना ही नहीं तो पौराणिक जी ने काकोरी काण्ड के रामप्रसाद बिस्मिल आदि क्रांतिकारियों को गुप्त रूप से पूर्ण सहयोग प्रदान किया। कुछ को तो आदर्श विद्यालय में नाम बदलकर छात्र दर्शा दिया गया। बिहार के मोस्ट वांटेड क्रांतिकारी ब्रह्मचारी को आदर्श विद्यालय में अध्यापक बनाकर रखा गया।

लेकिन ये सब क्रिया कलाप तत्कालीन सरकार को रास नहीं आ रहे थे। 1929 में गजट नोटिफिकेशन द्वारा गोपाल कृष्ण पौराणिक जी को पोहरी जागीर से निष्कासन व आदर्श विद्यालय बंद करने का फरमान जारी कर दिया गया। उस समय उनके सहयोगी बनकर सामने आये पोहरी के तत्कालीन जागीरदार राज राजेन्द्र श्री मालोजी राव नृसिंहराव शीतोले। यूं तो वे रिश्ते में ग्वालियर के तत्कालीन महाराजा जीवाजी राव सिंधिया जी के फूफाजी थे, किन्तु अंग्रेजों के जबरदस्त विरोधी। उनकी जागीर भी छोटी मोटी नहीं थी, आजादी के पूर्व ग्वालियर रियासत की सबसे बड़ी जागीर थी पोहरी, जिसमें लगभग दो सौ दस गाँव शामिल थे। विलायत होकर आये श्री शितोले ग्वालियर राज्य के गृह मंत्री व ग्राम विकास मंत्री भी रह चुके थे। उनकी पठन पाठन में भी गहरी रूचि थी, उनके विशाल पुस्तकालय में हर विषय से सम्बंधित पुस्तकें मौजूद थीं। यह केवल पुस्तकों का संग्रह नहीं था, बल्कि उनका वे सतत अध्ययन मनन भी करते थे। हर विषय की जानकारी रखना उनका शौक था। संक्षेप में कहा जाए तो जागीरदार होते हुए भी उनकी विचारधारा पूर्णतः राष्ट्रीय थी। अतः जब पौराणिक जी भटनावर से पोहरी आये तो सरदार शितोले साहब ने उनकी हर तरह से मदद की।

तब तक रतीराम भी साबरमती आश्रम से खादी व ग्रामोद्योग का प्रशिक्षण प्राप्त कर लौट आये थे। अतः उनको आधार बनाकर जब गोपाल कृष्ण पौराणिक जी ने समाज सुधार व ग्रामीण विकास कार्यों की योजना सरदार शितोले के सामने रखी, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। पौराणिक जी को 310 बीघा जमीन दान में दी, उसके लिए भवनों का निर्माण करवाया और कई लाख रुपये भी प्रदान किये। वह भी तब, जब महाराजा सिंधिया की पौराणिक जी पर वक्र दृष्टि थी। महाराजा सिंधिया ने रुष्ट होकर उनकी राज राजेन्द्र की पदवी छीन ली।

शितोले साहब ने इसकी कोई परवाह न करते हुए जब पोहरी में खादी बनना शुरू हुई, तो न केवल स्वयं भी उसका उपयोग किया, बल्कि पुलिस विभाग में सिपाहियों व चौकीदारों को जो बर्दी शासन की ओर से दी जाती थी, वह भी अनिवार्य रूप से खादी की कर दी गई। जब हाथ की बनी माचिस का निर्माण शुरू हुआ तो विमको की बनी विदेशी माचिस का परित्याग कर पोहरी निर्मित माचिस का प्रयोग शुरू कर दिया। संस्था ने कागज़ बनाना शुरू किया तो वे उसका भी उपयोग करने लगे व जागीर के सभी विभागों को उसका प्रयोग अनिवार्य कर दिया। किसी जागीरदार का इतना स्वदेशी प्रेम सचमुच हैरतअंगेज था। जागीर का शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग तो एक प्रकार से उन्होंने पौराणिक जी की संस्था के ही सुपुर्द कर दिया। कहा जाए तो गोपाल कृष्ण पौराणिक जी द्वारा स्थापित आदर्श विद्यालय व आदर्श सेवा संघ के वे प्राणतत्व बन गए।

आईये जरा उस दौर की इस कहानी को थोडा और विस्तार देते हैं । उन दिनों पोहरी किले के अन्दर ही बसी हुई थी। पौराणिक जी ने आज के किशनगंज अर्थात नई पोहरी की आधारशिला रखते हुए शिवपुरी श्योपुर व ग्वालियर पोहरी के चौराहे पर एक झोंपड़ी बनाई और नाम दिया कल्याण कुटी। आदर्श विद्यालय के पूर्व छात्र श्री वैदेही चरण पाराशर को किशनगंज बसाने और कल्याण कुटी की व्यवस्था का दायित्व दिया गया। शितोले साहब ने इस योजना में सहयोग देते हुए,  जो लोग किले के बाहर बसने आये, उन्हें निशुल्क जमीनें प्रदान कीं  

उसी दौरान एक सार्वजनिक सभा में पौराणिक जी ने छुआछूत को लेकर उसकी हानि बताते हुए एक उद्बोधन दिया और कहा कि हम सब एक ईश्वर की संतान हैं, अतः जिन्हें अछूत माना जाता है, उनके साथ भोजन करने में कोई आपत्ति नहीं होना चाहिए। बस फिर क्या था, हंगामा खड़ा हो गया। उस सभा में कोलारस के एक पंडित जी भी थे, उन्होंने श्री वैदेही चरण पाराशर जी के घर जाकर उनके माता पिता से कहा कि तुम्हारा बेटा तो अब भंगी चमारों के हाथ का खाना खाने लगा है। धर्म भ्रष्ट हो गया है। बस पाराशर जी के माता पिता कोलारस से पोहरी आ धमके और आमरण अनशन की धमकी देकर वैदेही चरण पाराशर जी को अपने साथ वापस ले गए।

पौराणिक जी ठहरे धुन के पक्के, काम तो चालू रखना ही था, तो विचार किया कि अब कौन व्यक्ति इस कार्य के लिए उपयुक्त हो सकता है, तो उन्हें श्री नारायण दास जी त्रिवेदी का ध्यान आया, जो उन दिनों हिन्दू कालेज दिल्ली में अध्ययनरत थे। उन्होंने नारायण दास जी को सन्देश भेजा तो वे अपनी पढाई बीच में ही छोडकर देवोत्थान एकादशी के पवित्र दिन पोहरी आ भी गए। कुछ ऐसा ही श्रद्धा भाव था उस जमाने की युवा पीढी में श्री गोपाल कृष्ण पौराणिक जी के प्रति। कृष्ण गंज की उस दुकान से मनिहारी या परचूनी का सामान खरीदने इक्का दुक्का लोग ही आते थे। कोई बस्ती तो थी नहीं वहां। लकड़ी व बिना थपे खेतों में पड़े सूखे गोबर को एकत्रित कर उससे ईंधन का काम लेना, और जो तीन चार पैसे बिक्री से प्राप्त होते, उनसे ही अपनी गुजर बसर करना, यही थी उन दिनों नारायण दास जी की दिनचर्या। कुछ समय बाद खादी उत्पादन शुरू करना तय हुआ तो रतीराम जी को भटनावर और नारायण दास जी को पोहरी की जिम्मेदारी सोंपी गई ।

रतीराम जी तो साबरमती आश्रम से प्रशिक्षण लेकर आये थे, किन्तु नारायण दास जी के लिए तो यह एकदम नया विषय था। वे घर घर घूमकर पहले पिछड़े समुदाय और जरूरत मंद लोगों को रुई बांटते, फिर किसी से पाव भर, किसी से आधा सेर कता हुआ सूत वापस एकत्रित करते। उसके बाद वह सूत गाँव के इकलौते बुनकर को देकर उससे आग्रह करते कि भाई आठ गिरह के अर्ज की जगह बारह गिरह का रखना। वह सुनी अनसुनी कर अपने काम में लगा रहता, तो देर तक उसकी स्वीकृति का इंतज़ार करते। मेहनत का परिणाम निकला और अल्प समय में ही कार्य को प्रसिद्धि भी मिल गई। ग्वालियर व्यापार मेले की प्रदर्शनी में पुरष्कार भी मिले। उसी साल जब आदर्श विद्यालय के छात्र मिडिल की परीक्षा देने शिवपुरी गए, तो पोहरी में बनी खादी के वस्त्र पहिनकर ही गए। यह बात अलग है कि उस समय की खादी आज की तरह सफ़ेद झकपक नहीं थी, एकदम सादा गंजी भर थी।

उधर भटनावर में रतीराम जी को असफलता हाथ लगी तो उन्हें भी पोहरी ही बुला लिया गया। फिर क्या था एक और एक ग्यारह बनकर इस जोडी ने कृष्णगंज की पुरानी मनिहारी परचूनी की दूकान को खादी भण्डार का रूप दे दिया। दो बुनकरों द्वारा लगातार खादी बुनी जाने लगी। रंगाई बुनाई का काम चलने लगा। धीरे धीरे नारायणदास जी की देखरेख में कागज़ व दियासलाई निर्माण का काम भी शुरू हो गया व इसके लिए कला मंदिर की स्थापना हो गई। यह वह दौर था जब शासनादेश से पौराणिक जी स्वयं जिला बदर होने के कारण खुलकर सामने नहीं आ पा रहे रहे थे, अतः सब काम उनके द्वारा नियुक्त टोली ही संभाल रही थी। उसी दौरान दिल्ली में पौराणिक जी की भेंट विख्यात इंजीनियर श्री गुंर्टू से हुई और उन्होंने कहा - तुम्हारा नाम तो देश के महान नेता श्री गोपाल कृष्ण गोखले के नाम पर है, क्या तुम्हारा काम भी उन जैसा नहीं हो सकता, अगर हो सके तो देश के लिये कोई काम करो । उनकी प्रेरणा से मुम्बई जाकर वहां से अंग्रेजी में “रूरल इंडिया” नामक अखबार निकाला । 1930 में पौराणिक जी ने गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लेते हुए एक वर्ष का कारावास भोगा ।

लेकिन तभी एक ऐसी घटना घटी जिसने एक बारगी तो सारी मेहनत पर पानी ही फेर दिया। हुआ कुछ यूं कि श्री गोपाल कृष्ण पौराणिक जी के जन्मदिवस पर पोहरी के सुप्रसिद्ध दर्शनीय धर्मस्थली केदारेश्वर पर सहभोज कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जिसमें भटनावर विद्यालय के छात्र भी आमंत्रित किये गए थे। शासनादेश से आदर्श विद्यालय बंद हो जाने के बाद वह विद्यालय शासकीय मिडिल स्कूल बन चुका था। यह अलग बात है कि वह पौराणिक जी की देखरेख में ही चलता था। उन छात्रों में मिडिल का एक छात्र वंशीधर चर्मकार भी था। सहभोज शुरू हुआ तो यह देखकर कि सवर्ण और मुसलमान छात्र तो साथ साथ एक ऊंचे स्थान पर बैठे हैं, किन्तु वंशीधर नीचे बैठा है, विद्यालय के एक अध्यापक ने उसे भी सबके साथ बैठा दिया। कुछ ब्राह्मण बालक तुरंत वहां से खिसक गए और भटनावर जाकर सबसे कह दिया कि आदर्श विद्यालय वाले तो हमें चमारों के साथ बैठाकर खाना खिलाते हैं। है न कमाल की बात कि मुसलमान बालकों के साथ बैठकर भोजन करने में किसी को कोई आपत्ति नहीं थी, आपत्ति थी तो तथाकथित अस्पृश्य दलित समाज के साथ भर बैठने से। भटनावर का यह दावानल पूरी जागीर में फ़ैल गया और गाँव गाँव में पंचायतें होने लगीं। आदर्श विद्यालय द्वारा संचालित शिक्षा विभाग के सभी स्कूल बंद हो गए। पंचायतों का स्पष्ट फरमान था कि जो भी उन विद्यालयों में पढ़ेगा, उसके पूरे परिवार का सामाजिक बहिष्कार होगा। भटनावर में तो जनता की ओर से एक धर्म स्कूल भी खुल गया। उस समय पोहरी जागीर में ऐसे चार मिडिल स्कूल व बीस पच्चीस प्राथमिक स्कूल थे।

श्रीमंत सरदार शितोले साहब का कहना था कि भले ही एक चर्मकार बालक ही स्कूल में आये, स्कूल चालू रखा जाए, उसे बंद न किया जाए। किन्तु स्कूल थे कि बंद होते जा रहे थे। केवल एक ककरौआ मिडिल स्कूल अपवाद था। यहाँ नारायण दास जी त्रिवेदी के लघुभ्राता देवीलाल जी त्रिवेदी प्रधानाचार्य थे। आमजन और विद्यार्थी दोनों ही उनसे प्रेम करते थे। इसके बाद भी जब अन्य स्थानों का प्रभाव वहां आया तो देवीलाल जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। अब जब कोई जान की बाजी ही लगा दे तो भला समाज कैसे न पसीजे। लोगों के दिल हिल गए और उन्होंने पंचायतों के फरमानों की परवाह न करते हुए, अपने बच्चों को विद्यालय भेजना जारी रखा।

पौराणिक जी को इस बात का कष्ट था कि जिस भटनावर से उन्होंने अपने इस मिशन को शुरू किया है, वहां से इस घटना का सूत्रपात हुआ है। उन्होंने आदर्श सेवा संघ के सभी सात जीवन व्रती कार्यकर्ताओं – श्री रामगोपाल, श्री हरीशंकर, श्री रतनलाल दीक्षित, श्री वैदेहीचरण पाराशर, श्री रतीराम और श्री नारायण दास जी त्रिवेदी को बुलाया और अर्धरात्रि में उनके सामने भाव विव्हल होकर कहा - कैसे भी हो भटनावर स्कूल बंद नहीं होना चाहिए। नारायण दास जी आप इसका दायित्व लीजिये ।

भावुक ह्रदय नारायण दास जी भला ना कैसे कह सकते थे, उन्होंने चुनौती स्वीकार की और बैठक से ही भटनावर के लिए रवाना हो गए। सबसे पहले वे पौराणिक जी के आत्मीय स्वजन किशोरीलाल जी पालीवाल से मिले। पालीवाल जी ने उनसे स्पष्ट शब्दों में कहा – नारायण दास जी आप क्या स्वयं पौराणिक जी आकर यहाँ बैठ जाएँ तो भी अब विद्यालय नहीं चल सकता। लोगों में अत्याधिक विरोध की भावना है। नारायण दास जी ने प्रभु का नाम लेकर विद्यालय की इमारत में प्रवेश किया। किसी जमाने में खांडेराव का महल रही इस भव्य इमारत की तीसरी मंजिल पर बने गुम्बज पर उन्होंने डेरा जमाया।

सुबह विचार किया कि विद्यालय तो सरस्वती का मंदिर होता है, अतः पहला कार्य तो इस मंदिर की साफ़ सफाई का होना चाहिए। उठाया एक तसला और झाडू और शुरू कर दी सफाई। विद्यालय के सामने ही एक कुआ था, अतः जल्द ही सबको पता चल गया कि कोई आया है स्कूल चालू करने तो शुरू हो गया तानों और फब्तियों का दौर। अरे देखो रे देखो – चमारों को पढ़ाने कोई सफाई कर्मी भंगी आया है। कोई कहता क्यों अपनी जान के दुश्मन बने हो, भाग जाओ, वरना लाश ही पहुंचेगी अस्पताल।

नारायण दास जी ने सबकी सुनी पर जबाब किसी को नहीं दिया, बक झक कर लोग वापस चले गए, उसके बाद नारायण दास जी जा पहुंचे उस वंशीधर चर्मकार के घर, जिसके कारण सारा झमेला खड़ा हुआ था। उसे आग्रह पूर्वक विद्यालय लाये और मैदान में खुले आसमान के नीचे उसे पढ़ाना शुरू कर दिया। पहला दिन ऐसे ही बीता – एक अध्यापक – एक शिक्षक। दूसरे दिन जब वंशीधर को पढ़ा रहे थे, नए खुले स्कूल में जाने को निकले दो बच्चे उन्हें देखकर ठिठक गए और पूछा क्या स्कूल खुल गया? नारायण दास जी ने स्वागत पूर्ण स्वर में कहा – हाँ हाँ खुल गया, आओ आओ पढाई शुरू करो, कई दिनों से स्कूल बंद है, इसलिए बहुत पिछड़ गए होगे। बच्चे आ भी गए। नारायण दास जी ने बड़े प्रेम से पहले तो उनके गंदे कपडे साबुन से धोकर सूखने डाले और फिर उन्हें चार दिन के पाठ एक ही दिन में पढाये। शाम को जब झकाझक साफ़ कपडे पहिनकर बच्चे घर पहुंचे तो मां बाप की हैरत का ठिकाना न रहा। गाँव का नया स्कूल तो केवल झोंक में प्रतिक्रिया स्वरुप खुला था, अतः पूरी तरह अव्यवस्थित था। लोग उससे उकता चुके थे, अतः अगले ही दिन दो की देखा देखी दस बच्चे पढ़ने आ गये। एक महीना बीतते न बीतते विद्यालय पूर्व की तरह ही गुलजार हो गया। पंचायतों के फरमानों की हवा निकल गई। अपना अभियान पूर्ण कर नारायण दास जी वापस पोहरी पहुँच गए और भटनावर विद्यालय में पूर्व के अध्यापकों ने ही अध्यापन कार्य प्रारम्भ कर दिया। सरदार शितोले और पौराणिक जी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

आखिर कौन थे ये नारायण दास ?

नरवर में दिनांक 5 दिसंबर 1905 को एक गौड़ ब्राह्मण परिवार में जन्मे नारायण दास जी के पिता श्री शिवदयाल जी त्रिवेदी मूलतः आज के हरियाणा में नारनौल जिले के ग्राम मढाना के निवासी थे, जो पोस्ट एंड टेलीग्राफ विभाग की सेवा के चलते शिवपुरी आये थे। बीस वर्ष की आयु में नारायण दास जी का श्रीमती भगवान देवी से विवाह हुआ, किन्तु आठ वर्ष बाद ही 1928 में पत्नी और पिता दोनों ने संसार से विदा ले ली और बाईस वर्षीय तरुण नारायणदास जी ने अपना जीवन लक्ष्य बना लिया – आत्मनो मोक्षार्थ, जगद्धिताय च। सबका भला करते हुए स्वयं का कल्याण। 1929 से 1943 तक आचार्य गोपाल कृष्ण पौराणिक जी के निर्देश पर आदर्श विद्यालय के प्रधानाचार्य व ग्राम कला केंद्र के व्यवस्थापक रहते हुए राष्ट्रसेवा में जुटे रहे । उसके बाद गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होने वाली कल्याण पत्रिका को पढ़ते पढ़ते मन में आया कि भगवान हैं या नहीं, यह अनुभव से जानना चाहिए। तो बिना जेब में एक पैसा लिए 1 जून 1943 को निकल पड़े पोहरी से। शरीर पर महज एक जोडी वस्त्र। संकल्प लिया कि एक महीने तक किसी से कुछ मांगूंगा भी नहीं, ईश्वर है तो स्वयं कुछ व्यवस्था होगी, अन्यथा तो शरीर छूट ही जाएगा आश्चर्य जनक है कि 30 जून 1943 को नारायण दास जी सकुशल सीतापुर पहुँच गए। यहाँ आते आते ईश्वर पर आस्था और विश्वास दृढ होता गया। उसे और सुद्रढ़ करने का निर्णय लिया और यात्रा का नया लक्ष्य बद्रीनाथ धाम बना लिया। प्रभु कृपा से यह सत्यसंकल्प भी पूर्ण हुआ और उसके साथ ही यह विश्वास भी अटल हो गया कि प्रभु अपने शरणागत की चिंता करते ही हैं। किसी से याचना की आवश्यकता ही नहीं होती, यहाँ तक कि उस परमपिता परमेश्वर से भी नहीं। वह करुणा सागर तो बिना मांगे सब कुछ देता है। कभी किसी रूप में तो कभी किसी रूप में।

इस यात्रा के बाद शिवपुरी आकर एकांत और निर्जन स्थान में एक वृक्ष के नीचे बैठ गए। उसी स्थान पर तीन बालक शिक्षा प्राप्त करने आ गए, इसे प्रभु इच्छा मानकर उन्होंने उन बालकों को पढ़ाना शुरू कर दिया। शनैः शनैः यह तीन बालकों की संस्था बढ़कर “भारतीय विद्यालय” में रूपांतरित हो गई। अनूठी आश्रम पद्धति का शिवपुरी का प्रथम आवासीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय। इसे देखकर तत्कालीन केन्द्रीय शिक्षा मंत्री श्री के एल श्रीमाली की प्रतिक्रिया थी – यह संस्था अन्य संस्थाओं के लिए अनुकरणीय है।

अखिल भारतीय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष श्री उ.न. ढेवर तो इतने प्रभावित हुए कि इसे नए भारत की नींव और मूल बताया।

समय के साथ नारायण दास जी आध्यात्मिक उन्नति के सोपान चढ़ते गए। लोग उन्हें महात्मा जी कहने लगे और जिस झोंपड़ी में उनका आवास था, वहां आज भी प्रति गुरूपूर्णिमा को उनके अनुयाई एकत्रित होकर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

उनके द्वारा लिखित पुस्तकें, गीतामृत, रामचरित मानस के दस प्रसंग, साधक शंका समाधान, साधक प्रश्नोत्तर शतक, साधक विचार प्रगति, साधक साधना, जैसे मैंने सीखा, कुण्डलिनी, आत्मबोध, रिअलाईजेशन ऑफ़ सेल्फ, साधना, स्वशक्ति साधना का संक्षिप्त परिचय, दिव्यशक्ति बोध, वचनामृत, बुद्धि विकास, बापू के एकादश वृत, ईसावास्योपनिषद, मानव विकास की पूर्णता, कुण्डलिनी का जीवन में उपयोग, रामचरित मानस में कुण्डलिनी, “मैं” पन का विवेचन आदि उनकी आध्यात्मिक ऊंचाई को दर्शाती हैं।

आदर्श विद्यालय से निकले अन्य विशिष्ट जन –

पोहरी के इस आदर्श विद्यालय ने देश को अनेक विभूतियाँ प्रदान कीं। उनमें से ही एक थे प्रख्यात इतिहासकार और शिक्षाविद डॉ. हरिहर निवास द्विवेदी। वे और उनकी पत्नी श्रीमती विद्यादेवी दोनों ने साथ साथ आदर्श विद्यालय में ही शिक्षा प्राप्त की थी और बाद में साथ साथ ही विद्यालय में शिक्षक भी रहे। पौराणिक जी के सहयोग से डॉ. द्विवेदी ने उच्च शिक्षा आगरा से तथा विद्यादेवी ने दिल्ली से प्राप्त की। ख़ास बात यह कि इन दोनों का विवाह भी आर्यसमाजी पद्धति से आदर्श विद्यालय प्रांगण में ही हुआ। बाद में डॉ. हरिहर निवास द्विवेदी जी ने सन 1937 में मुरार ग्वालियर में विद्या मंदिर के नाम से एक विद्यालय प्रारंभ किया।

श्री गोपाल कृष्ण पौराणिक जी के जीवन के अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम कुछ इस प्रकार हैं -
1934 में कांग्रेस से त्यागपत्र
1938 में मुम्बई से अंग्रेजी पत्रिका rural india का प्रकाशन 
उसी वर्ष महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर ग्वालियर महाराज बाड़े पर श्री विनायक दामोदर सावरकर जी के मुख्य आतिथ्य में विशाल आमसभा का आयोजन व वीरांगना की समाधि पर उन्हें श्रद्धांजलि व परिचर्चा का आयोजन 
महाराज सिंधिया द्वारा दिए गए मंत्रीपद के प्रस्ताव को अपने ग्रामोत्थान प्रकल्प में बाधा मानकर अस्वीकार करना 
1951 में आचार्य कृपलानी जी द्वारा गठित "किसान मजदूर प्रजा पार्टी" में शामिल 

जीवन भर सत्ता और पद की राजनीति से दूर रहने वाले शिवपुरी जिले के आदर्श महानायक श्री गोपाल कृष्ण जी पौराणिक ने 31 अगस्त 1965 को अपनी जीवन यात्रा को विराम दिया, उनका अंतिम संस्कार 1 सितम्बर 1965 को हुआ । 

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क्रांतिदूत: शिवपुरी का इतिहास भाग 5 - स्व.श्री गोपालकृष्ण पौराणिक, पोहरी के जागीरदार शितोले और महात्मा नारायण दास जी त्रिवेदी
शिवपुरी का इतिहास भाग 5 - स्व.श्री गोपालकृष्ण पौराणिक, पोहरी के जागीरदार शितोले और महात्मा नारायण दास जी त्रिवेदी
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क्रांतिदूत
https://www.krantidoot.in/2021/04/history-of-shivpuri-Gopalkrishna-Puranic-m-n-shitole-jagirdar-of-pohri-and-Mahatma-Narayan-Das-Trivedi.html
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