शिवपुरी का इतिहास भाग 2 - 1857 की कही अनकही दास्तान

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जहाँ तक शिवपुरी का सवाल है, यह भी अपने आप में काफी इतिहास समेटे हुए है। सम्राट अकबर 1564 में जब हाथियों के शिकार के लिए मांडू जा रहा था, तब...





जहाँ तक शिवपुरी का सवाल है, यह भी अपने आप में काफी इतिहास समेटे हुए है। सम्राट अकबर 1564 में जब हाथियों के शिकार के लिए मांडू जा रहा था, तब वह यहाँ भी रुका था। सत्रह वीं शताब्दी में यह जागीर के रूप में नरवर के शासक अमरसिंह कछवाहा को सोंपी गई। लेकिन जब दिल्ली के शहजादे खुसरू ने विद्रोह किया, तब उसका साथ देने के कारण उसे सत्ताच्युत होना पड़ा। बाद में उसके पौत्र अनूप सिंह को नरवर के साथ शिवपुरी और कोलारस की जागीरें भी प्रदान कर दी गई। सन १८०४ में यह क्षेत्र सिंधियाओं के अधिकार में आया।

महादजी सिंधिया के समय से ही सिंधिया राजवंश के अंग्रेजों से सम्बन्ध बढ़ने लगे थे। 1843 में महाराज जनको जी राव के देहांत के समय उनकी विधवा ताराबाई की उम्र केवल तेरह वर्ष थी। स्वाभाविक ही वे निसंतान भी थीं। महाराज को मरणासन्न देखकर अंग्रेज कूटनीति को समझने वाले सरदार आंग्रे ने त्वरित निर्णय लिया। वे उस मैदान में पहुंचे जहाँ मराठा सरदारों के बच्चे कंचे खेल रहे थे। सरदार आंग्रे ने देखा कि उनमें से एक आठ वर्षीय वालक का निशाना बहुत अचूक होता है। उन्होंने तुरंत उस बच्चे को अपने साथ घोड़े पर बैठाया और राजमहल लेकर पहुंचे। रियासत बचाने के लिए मराठा सरदार हनुमंत राव का वह बेटा भागीरथ राव, महाराज जनकोजी राव ने मृत्युशैया पर ही गोद लिया, और महाराज की मृत्यु के बाद उन्हें जयाजीराव के नाम से नया महाराज घोषित कर दिया गया। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने नए महाराज को मान्यता नहीं दी और प्रशासक के रूप में अपने एक बफादार दिनकर राव राजबाड़े को नियुक्त कर दिया।

गोपालपुर गढ़ी

तभी प्रारंभ हुआ अंग्रेजों के विरुद्ध अट्ठारह सौ सत्तावन का स्वातंत्र समर। झांसी की पराजय के बाद नाना साहब और महारानी लक्ष्मीबाई जब कालपी में अंग्रेजों से आरपार की लड़ाई में व्यस्त थे, भविष्य की रणनीति बनाने को तात्या टोपे अपने बीमार पिता से मिलने के बहाने वर्तमान शिवपुरी जिले के गोपालपुर आये और यहाँ ही उन्होंने तत्कालीन सिंधिया राज्य के सरदारों के साथ मिलकर वह रणनीति बनाई थी, जिसके कारण ग्वालियर पर उनका कब्जा बिना किसी युद्ध के हो गया। सिंधिया को ग्वालियर छोड़ आगरा जाना पड़ा और ग्वालियर के खजांची अमर चंद्र बांठिया ने पूरा खजाना क्रांतिकारियों के लिए खोल दिया। स्पष्ट है कि गोपालपुर निवासी खांदी के जागीरदार राव रघुनाथ सिंह क्रांतिकारियों के विश्वासपात्र थे एवं उन्होंने अपेक्षा के अनुसार पूरा सहयोग भी किया। गोपालपुर गढ़ी में रहते हुए ही तात्या टोपे ने ग्वालियर पहुंचकर वहां के सैनिकों, सेना नायकों से वार्ता स्थापित कर उन्हें अपनी ओर शामिल कर लिया।

ग्वालियर में महारानी के बलिदान के बाद भी क्रांतिकारियों ने इस गढ़ी में शरण ली, किन्तु सूचना मिलने पर अंग्रेजों ने इस गढ़ी को चारों ओर से घेर लिया गया। इस दौरान राव रघुनाथ सिंह ने क्रांतिकारियों को तो गुप्त रास्ते से सुरक्षित गढ़ी से बाहर निकाला और स्वयं को परिवार सहित अंग्रेजी दमन और अत्याचार सहने के लिए अंग्रेज सेना और अधिकारियों के हवाले कर दिया। उनकी गोपालपुर, खांदी तथा गोंदोली रियासतें छीन ली गई। गोपालपुर स्थित गढ़ी पर अंग्रेजों के आक्रमण के सबूत आज भी गढ़ी की दीवारों पर स्पष्ट दिखाई देते हैं। गढ़ी की दीवारों में आज भी अंग्रेजों की तोपों से निकले गोले धंसे हुए हैं।

शिवपुरी में सैनिक विद्रोह

14 जून 1857 को मुरार छावनी में सैनिक विद्रोह हुआ । सैनिकों ने दोपहर डेढ़ बजे छावनी बंगला जलाया फिर मेसहाऊस और मेस बैटरी को आग के हवाले किया । उन्होंने शिवपुरी और ग्वालियर के मध्य की तार लाइन काट दी और बम्बई आगरा मार्ग की मुख्य संचार व्यवस्था को खतरा उत्पन्न कर दिया । भयभीत ग्वालियर के पालिटिकल एजेंट मेकफर्सन ने मुरार कण्टोनमेंट और शस्त्रागार प्रभार ग्वालियर के महाराज जियाजीराव सिंधिया को सोंप दिया । मुरार छावनी में रात में संघर्ष विद्रोही सैनिकों ने सात अधिकारी और छै सार्जेंट मार गिराये । पोलटिकल एजेंट मेकफर्सन तथा उनके कुछ अधिकारियों ने सपरिवार फूलबाग महल में शरण ली । महाराजा के अंगरक्षकों ने उन्हें आगरा की ओर चम्बल नदी तक पहुंचाया ।

20 जून को शिवपुरी में भी विद्रोह हुआ । 1857 में यहां ग्वालियर राज्य की सैना रहा करती थी । जिसमें दूसरा रिसाला और तीसरी पलटन शामिल थी । जब यहां की सैना बिगडी तो यहां यूरोपियन गोरे साहबों को प्राण रक्षा के लिए भागना पड़ा । वे इंदौर जाना चाहते थे किन्तु जब राजगढ़ तक पहुंचे, तभी उन्हें सूचना मिली कि विद्रोह को दबा दिया गया है, अतः वे वापिस लौट आये । इस विद्रोह में जो अंग्रेज अफसर मारे गये थे उन्हें पोहरी बायपास रोड पर बने गेवेयार्ड (ईसाइयों के कब्रिस्तान) में दफनाया गया था । 1980 के पहले तक यहां अनेक ऐसी समाधियां थी जिन पर स्थापित शिलालेखों पर मरने बाले का नाम और जन्म और मृत्यू की तारीखें बड़ी ही भावनात्मक भाषा के साथ लिखी हुई थी । आज अधिकांश शिलालेख नष्ट हो चुके हैं ।

तात्या टोपे

18 अप्रैल 1859 वह काला दिवस, जिस दिन तात्याटोपे को शिवपुरी में फांसी दी गई । 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महानायक तात्याटोपे के पिता श्री पाडूरंग राव भट्ट पूना के अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के मंदिर में पुजारी थे । सन 1814 में मराठों की शक्ति और साम्राज्य के पतन का समय था, पराजय के उपरांत अंग्रेजो से हुई संधि के अनुसार पूना राज्य के बदले 8 लाख रूपये वार्षिक पेंशन लेकर पेशवा कानपुर के पास गंगा तट बसे बिठूर पहुँच गए। उनके साथ उनके आश्रय में रहने बाले अनेक परिवार भी थे, जिनमें एक परिवार पांडूरंगराव भट्ट का भी था । तात्या की आयु इस समय मात्र चार वर्ष की थी । बचपन से ही ब्राहमणोचित संस्कार और क्षत्रियोचित मनोवृति के मध्य जो शिक्षा पायी उसमें शस्त्र और शास्त्र का मिश्रण था । पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब और भविष्य की महारानी लक्ष्मीबाई और तब की नन्हीं मनु के साथ तात्या भी बड़े होने लगे । तात्या,नाना और मनु साथ रहते,खेलते और अस्त्र-शस्त्र चलाने से लेकर घुड़सवारी तक सीखते । आगे चलकर १८५७ स्वतंत्रता समर में भी इन तीनों ने साथ साथ अंग्रेजों से संघर्ष किया । यह कहानी सर्वज्ञात है ।

२० जून को ग्वालियर के रणांगण में हुई पराजय व महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान उपरांत घायल मराठा शेर तात्या टोपे मध्यभारत के जंगलों में प्रविष्ट हो गया । उसके पास न सेना थी, न तोपें और ना ही धन । अपनी बची खुची सेना को लेकर तात्या और पेशवा नाना साहब के भाई राव साहब ने सरमथुरा नामक ग्राम में पहुंचकर अपनी भावी रणनीति पर विचार किया, और प्रत्यक्ष युद्ध के स्थान पर छापामार युद्ध जारी रखने का निश्चय किया । अब सवाल था सेना के लिए रसद और शस्त्रास्त्र का, तो उसके लिए इतने राजे रजबाड़े थे ही । राजी नहीं तो गैर राजी । यत्र तत्र बिखरे इन राजाओं के पास नाम मात्र की सेना होती थी, जो थी वह भी क्रांतिवीरों के प्रति सहानुभूति रखने वाली, अतः राजाओं पर, युद्ध कर लादने में कहाँ कठिनाई आने वाली थी । बस इसी रणनीति पर चलते हुए संघर्ष जारी रहा । फिर तो मध्य हिन्दुस्तान के वन, गुफाएं, ग्राम, नगर, सभी और से तात्या टोपे की प्रचंड रण गर्जनाओं के स्वर सुनाई देने लगे । भरतपुर जयपुर से तो आसानी से मदद मिल गई, टोंक के नबाब ने आनाकानी की भी, किन्तु उसकी सेना तात्या से लड़ने को तैयार ही नहीं हुई और नबाब का तोपखाना लेकर तात्या आगे दक्षिण की तरफ बढ़ गए । होम्स की सेना लगातार पीछे लगी हुई थी । सामने बाढ़ से उफनती चम्बल आई तो तात्या राह बदलकर बूंदी पहुँच गए । वहां से नीमच, भीलबाड़ा के पास सरवर नामक ग्राम में ७ अगस्त को अंग्रेज सेना से मुठभेड़ भी हुई, किन्तु तात्या उन्हें झांसा देकर नाथद्वारा में श्रीनाथ जी के दर्शन करने पहुँच गए ।

१४ अगस्त को हुई मुठभेड़ में तात्या के हाथ से तोपखाना निकल गया लेकिन चम्बल पारकर तात्या अंग्रेजों की आँख में धूल झोंककर साफ़ बचकर झालरापाटन में दिखाई दिये । यहाँ भी टोंक की कहानी दोहराई गई और राजा ने हेकड़ी दिखाने की कोशिश की । लेकिन नतीजा टोंक जैसा ही निकला, उसकी सेना ने भी तात्या को ही स्वामी मान लिया और राजा से पंद्रह लाख दंड स्वरुप लेकर, उसकी सेना को अपनी सेना बनाकर, बत्तीस तोपें ले तात्या आगे बढ़ गए । तात्या का अगला लक्ष्य इंदौर था, किन्तु मार्ग में राजगढ़ के पास अंग्रेजों ने एक बार फिर उन्हें घेर लिया । तात्या को तोपखाना फिर छोड़ना पड़ा । लेकिन उससे उन्हें क्या फर्क पड़ता था, जंगलों में होते हुए वे सिरोंज पहुँच गए, जहाँ फिर से उन्हें चार तोपें मिल गईं ।

इस स्थिति का वर्णन करते हुए एक अंग्रेज लेखक ने लिखा – उसने ऐसे पराजित एशियावासियों की सेना को संगठन सूत्र में बांधा था, जिनसे उसका कोई सम्बन्ध भी नहीं था । वह लगातार हारता गया, पीछे हटता गया, लेकिन पराजय का उपहास उड़ाते लगातार लड़ता गया । उसका नाम यूरोप भर में अनेक एंग्लो इंडियन सेनापतियों की अपेक्षा अधिक प्रसिद्ध हो गया । उसने जनता में से ही अपने ऐसे स्वयंसेवक तैयार किये, जिन बेचारों को प्रतिदिन ही उसके साथ साठ सत्तर मील पैदल दौड़ना पड़ता था, आर्थिक लाभ कुछ नहीं, ऊपर से फांसी पर लटका दिए जाने का डर, इसके बावजूद गरमी सर्दी बरसात से टकराते कभी दो हजार तो कभी पंद्रह हजार सैनिक उसके साथ अंग्रेजों से टकराते दिखे ।

१७ जनवरी १८५९ को लन्दन टाईम्स ने भी तात्या की प्रशंसा करते हुए लिखा –

खतरनाक और चतुर शत्रु तात्या टोपे की प्रशंसा करनी होगी, जिसने विगत जून से मध्य भारत को अपने पक्ष में कर रखा है । उसने हमारे केंद्र, खजाने और शस्त्रागार लूटे, सेना खडी की, फिर उसे खोया, युद्ध लडे, किन्तु पराजित हुआ, स्थानीय राजाओं से बंदूकें छीनीं, लेकिन वह भी उसके पास नहीं रहीं, इसके बाद भी उसकी गतिविधि बिजली की तरह चमकदार हैं । कई हफ़्तों से वह प्रतिदिन ३०-४० मील चल रहा है, कभी नर्मदा के इस पार तो कभी उस पार, पहाड़, नदियाँ, नाले और घाटियाँ, भीषण दलदल कोई उसका रास्ता नहीं रोक सका, कभी आगे तो कभी पीछे, कभी साइड से तो कभी लहराते, वह हमारे केन्द्रों में या उनके आगे पीछे ही रहा ।

अंग्रेज भले ही तात्या को धन्य धन्य कह रहे हों, लेकिन समय उसके पक्ष में नहीं था । अक्टूबर १८५८ आते आते क्रांति की ज्वाल मद्धिम पड़ चुकी थी । उनका अपना महाराष्ट्र, उनका अपना नागपुर, साथ आने में संकोच कर रहा था । तात्या महाराष्ट्र से निजाम की ओर बढे, किन्तु अंग्रेजी सेनायें भी दक्षिण प्रवेश बाधित करने आगे बढीं, तात्या का नर्मदा किनारे कर्गूण गाँव में मेजर संडरलेंड से डटकर संघर्ष हुआ । युद्ध जब अपने पूरे यौवन पर था, अचानक तात्या ने अपने सैनिकों को गोलियां बरसाना बंद कर नर्मदा में कूदने का आदेश दे दिया । अंग्रेजों को समझ में ही नहीं आया कि यह क्या हो रहा है, तब तक पूरी सेना अंग्रेजों को मुंह चिढाते हुए नर्मदा पार पहुँच गई । अब तात्या बडौदा की ओर बढे, किन्तु तात्या का पीछा करते पार्क भी छोटा उदयपुर पहुंच गया और तात्या को बडौदा पहुंचने का विचार छोड़ना पड़ा । ये लोग बांसबाडा के जंगलों में थे, तभी अब तक साथ में जूझ रहे बांदा के नबाब ने इंग्लेंड की महारानी द्वारा की गई आम माफी की घोषणा को सुनकर आत्म समर्पण का निर्णय लिया । राव साहब तथा तात्या भी वही मार्ग अपना सकते थे, किन्तु फिर आज इतिहास उन्हें कैसे याद रखता ?

तात्या उदयपुर की ओर बढे किन्तु अंग्रेजों की सजगता के चलते अंततः वनों में ही छुपना पड़ा । उसी समय अवध का प्रख्यात वीर शहजादा फीरोज शाह भी अतुलनीय शौर्य का प्रदर्शन करते हुए, गंगा जमुना पार कर, उनकी मदद को अपनी सेना लेकर आ गया । 13 जनवरी १८५९ को फिरोजशाह, तात्या टोपे और पेशवा राव साहब की इंद्रगढ़ में भेंट हुई । उस समय शिंदे का एक दरबारी मान सिंह भी वहां था । तभी अंग्रेज सेना के पहुँचने की सूचना पर इन लोगों को प्रस्थान करना पड़ा । अंग्रेज किसी भी कीमत पर इन लोगों को फंदे में लेने के लिए प्रयत्नशील थे । १६ जनवरी १८५९ को देवास के पास ये लोग एक बार पुनः घेर लिए गए । किन्तु पकड़ना इतना आसान थोड़े ही था । २१ जनवरी को अलवर के पास सीकर में क्रांति की इस अंतिम टोली ने अपनी आख़िरी लड़ाई सेनापति होम्स की सेनाओं से लड़ी, किन्तु उसके बाद तात्या और राव साहब ने अपनी सेनाओं से विदा ले ली और खुद भी अलग अलग हो गए । विजय की संभावना तो शेष थी नहीं, अब छापामार लड़ाई के नाम पर लगातार के पलायन से भी सब ऊब और थक चुके थे ।

तात्या के साथ अब केवल दो अश्व, एक टट्टू, दो ब्राह्मण रसोईये और एक सेवक ही था । अपने इस परिवार के साथ वे पारौन के जंगलों में ग्वालियर के सरदार मानसिंह के पास पहुंचे । जल्द ही अंग्रेजों को सूचना मिल गई कि तात्या अब मानसिंह के पास रह रहे हैं । अंग्रेज चूंकि कई बार तात्या को पकड़ने का प्रयत्न कर असफल हो चुके थे, अतः उन्होंने मानसिंह को मोहरा बनाया । उसके पास प्रस्ताव भेजा कि अगर वह तात्या को पकड़वा देगा, तो उसे न केवल क्षमादान मिलेगा, वरन शिंदे से नरवर का राज्य भी उसे दिलवा दिया जाएगा । मानसिंह उस प्रलोभन में आ गया और उसने तात्या को बताया कि वह अंग्रेजों के समक्ष आत्म समर्पण करने जा रहा है । साथ ही उन्हें एक सुरक्षित स्थान पर रहने का सुझाव दिया और कहा कि वह तीन दिन बाद आकर उनसे भेंट करेगा । मानसिंह तात्या का पुराना सहयोगी था, वह धोखा देगा, यह कल्पना भी तात्या को नहीं थी । शायद उन्होंने यह भी सोचा हो कि अगर इसके मन में कोई खोट होता तो आत्म समर्पण की बात भी क्यों बताता । जो भी हो मानसिंह ने अंग्रेजों को उस स्थान की जानकारी दे दी, जहाँ तात्या छुपे हुए थे । तीन दिन बाद ७ अप्रैल १८५९ अर्धरात्रि को मानसिंह तात्या के पास पहुंचा जरूर पर अंग्रेज सैनिकों के साथ । तात्या उस समय सोये हुए थे । जब उनकी नींद खुली तो स्वयं को अंग्रेजों के बंदी रूप में पाया ।

दूसरे दिन प्रातः काल जनरल मीड की सैनिक छावनी शिवपुरी में अदालत का नाटक हुआ । अपने ऊपर लगाए गए विद्रोह के आरोप के जबाब में तात्या ने कहा कि मैंने जो कुछ भी किया, अपने स्वामी पेशवा के आदेशानुसार किया, मैंने या मेरे स्वामी ने भी युद्ध के अतिरिक्त किसी भी यूरोपियन पुरुष, स्त्री, अथवा बालक की निरर्थक हत्या नहीं की । इसके अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं कहना । अदालत के विशेष अनुरोध पर तात्या ने क्रान्ति के पुनीत प्रारम्भ से लेकर अंत तक की सारी घटनाओं की सिलसिलेवार जानकारी भी दी । लिपिक ने वह सम्पूर्ण विवरण लिखा, जिसके नीचे तात्या ने अपने हस्ताक्षर भी किये ।

जांच पड़ताल और पूछताछ का नाटक ख़तम हुआ और तात्या टोपे को फांसी का दंड सुना दिया गया । १८ अप्रैल दोपहर चार बजे उन्हें तीसरी बंगाल गोरी सेना के कड़े पहरे में वध स्तम्भ के समीप लाया गया । तात्या ने अंग्रेजों से एक ही आग्रह किया कि ग्वालियर में रह रहे उनके वृद्ध पिताजी को किसी प्रकार त्रस्त न किया जाए । तात्या के पैरों में पडी बेड़ियाँ काट दी गईं । वह नर पुंगव तीव्र गति से सीढियां चढ़ गया । जब वधिक उनके हाथ पैर बांधने पहुंचे तब हंसते हुए तात्या ने कहा, इसकी क्या आवश्यकता है और अपने हाथ से फांसी का फंदा अपने गले में डाल लिया, मानो कोई पुष्पमाल पहन रहे हों । अगले ही पल तख्ता खींच लिया गया और पेशवा के राजनिष्ठ सेवक, स्वातंत्र समर के महा नायक, हिन्दुस्तान के निर्भीक और कुशल सेनापति तात्या टोपे का निर्जीव शरीर हवा में झूलने लगा । वध मंच रक्त से भीगा, तो यह आख्यान पढ़ते सुनते वर्षों से असंख्य देशप्रेमियों की, हमारी आपकी आखें अश्रुकणों से भीगती आ रही हैं ।

1857 में शिवपुरी के अन्य नायक-

शिवपुरी जिले का करैरा परगना महारानी लक्ष्मी बाई के राज्य झांसी का हिस्सा था । इसलिये झांसी की सैना में यहां के अनेक लोग जनरल और कर्नल तक के पदों की शोभा बढ़ा रहे थे । वे अपनी महारानी के प्रति पूर्ण बफादार थे । इनमें ग्राम उद्गवां कटीली के जवाहर सिंह, ग्राम नोनेर के दीवान रघुनाथ सिंह, ग्राम अम्बारी के चुन्नी यादव और झंडू यादव, दिनारा के गनपत कोरी, मनपुरा के मधुकर शाह और राहतगढ़ के गुलाम गोसखान थे । 1857 की क्रांति की आग तो शांत हो गई पर अग्रेजों के दमन और अत्याचार की आग ने इनके परिवारों को अनेक वर्षों तक जलाये और झुलसाये रखा । इनके खेतों और घरों में आग लगा दी गई । स्त्रीयों और बच्चों को मारा पीटा गया,अपमानित किया गया ।

आग जो बुझी नहीं

1857 में अंग्रेजों की विजय के उपरांत उनके दमन चक्र में जनता पिसने लगी । 1857 की क्रांति में जिन लोगों का हाथ था अथवा महारानी लक्ष्मी बाई की सैना में जो लोग काम कर रहे थे और उनके वफादार थे उन्हें पहचान पहचान कर सताया जाने लगा । खेतों में आग लगाई गई, मकान जलाए गए और सैनिकों अथवा सैनापतियों को ही नहीं उनके परिवार के लोगों को भी शारीरिक व मानसिक यातनायें दी गई । अंग्रेजों ने दमन के लिए अनेक स्थानों पर सैनिक टुकड़िया स्थापित कर दीं । शिवपुरी के छावनी के इलाके में भी अंग्रेजों की एक सैना रहा करती थी । इस समय भी शिवपुरी में क्रांतिकारी गतिविधियां अपने तरीके से संचालित होती रहीं । कोलारस में तहसील कार्यालय के निकट एक कमरा गोल गुम्बद था जहां क्रातिकारी गोला-बारूद छिपा कर रखा करते थे । इस कमरे पर युद्ध के समय तोप का गोला गिरने से एक बड़ा छेद हो गया था ।

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क्रांतिदूत: शिवपुरी का इतिहास भाग 2 - 1857 की कही अनकही दास्तान
शिवपुरी का इतिहास भाग 2 - 1857 की कही अनकही दास्तान
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